Cherreads

UNTitled,Nikita_Lodhi1774013974

Nikita_Lodhi
7
chs / week
The average realized release rate over the past 30 days is 7 chs / week.
--
NOT RATINGS
187
Views
VIEW MORE

Chapter 1 - एक शहरी कहानी -खुशी या शुकाल की

एक शहरी कहानी — खुशी और शुकाल

दिल्ली शहर की तेज़ रफ्तार ज़िंदगी में हर कोई कहीं न कहीं भाग रहा था — कोई सपनों के पीछे, कोई पैसों के पीछे, और कोई खुद को ढूँढने के पीछे।

खुशी भी उन्हीं लोगों में से एक थी। वह एक छोटे शहर से पढ़ाई करने दिल्ली आई थी और अब एक डिजिटल मार्केटिंग कंपनी में काम करती थी। उसका नाम जैसे उसकी पहचान था — हमेशा मुस्कुराने वाली, दूसरों की मदद करने वाली, और छोटी-छोटी चीज़ों में खुशी ढूँढ लेने वाली लड़की।

दूसरी तरफ था शुकाल। शांत स्वभाव का, थोड़ा कम बोलने वाला, लेकिन बहुत समझदार लड़का। वह एक ऐप डेवलपर था और उसी बिल्डिंग की दूसरी कंपनी में काम करता था जहाँ खुशी की ऑफिस थी।

उनकी पहली मुलाकात लिफ्ट में हुई।

लिफ्ट अचानक बीच में रुक गई। अंदर सिर्फ दो लोग थे — खुशी और शुकाल।

"लगता है आज ऑफिस लेट पहुँचेंगे," खुशी ने हँसते हुए कहा।

शुकाल ने हल्की मुस्कान दी, "या फिर आज काम से छुट्टी मिल जाए।"

दोनों हँस पड़े। वही छोटी-सी बातचीत उनकी दोस्ती की शुरुआत बन गई।

अब रोज़ सुबह कॉफी मशीन के पास मुलाकात होने लगी। कभी काम की बातें, कभी शहर की, कभी सपनों की। खुशी शहर को जीना चाहती थी, जबकि शुकाल शहर से थोड़ा दूर रहकर अपने सपनों की दुनिया बनाना चाहता था।

एक दिन बारिश हो रही थी। ऑफिस से निकलते समय खुशी छाता लाना भूल गई। शुकाल ने बिना कुछ कहे अपना छाता उसकी तरफ बढ़ा दिया।

"और तुम?" खुशी ने पूछा।

"मैं बारिश पसंद करता हूँ," उसने मुस्कुराकर कहा।

उस दिन पहली बार खुशी को लगा कि शुकाल सिर्फ शांत नहीं, बल्कि बहुत गहरा इंसान है।

समय के साथ दोनों की दोस्ती मजबूत होती गई। मेट्रो की यात्राएँ, सड़क किनारे चाय, और रात को लंबी चैट — शहर की भीड़ में उन्होंने अपनी छोटी-सी दुनिया बना ली।

लेकिन शहर की ज़िंदगी आसान नहीं होती। एक दिन खुशी को दूसरे शहर में बड़ी नौकरी का ऑफर मिला। यह उसके सपनों का मौका था।

वह खुश भी थी और उलझी हुई भी।

"तुम जाओगी?" शुकाल ने पूछा।

खुशी कुछ देर चुप रही, "सपने भी जरूरी हैं… लेकिन कुछ लोग भी।"

शुकाल ने धीरे से कहा, "अगर सपना सच में तुम्हारा है, तो जाना चाहिए।"

उसकी बात में अपनापन था, रोकने की कोशिश नहीं।

खुशी ने नौकरी स्वीकार कर ली।

जाने वाले दिन रेलवे स्टेशन पर दोनों खड़े थे। भीड़ थी, शोर था, लेकिन उनके बीच अजीब-सी खामोशी।

"दिल्ली याद आएगी," खुशी बोली।

शुकाल मुस्कुराया, "दिल्ली नहीं… कुछ लोग।"

ट्रेन चलने लगी। खुशी खिड़की से बाहर देखती रही, और पहली बार उसे समझ आया कि शहर सिर्फ इमारतों से नहीं बनता — लोगों से बनता है।

कुछ महीनों बाद, एक शाम खुशी को एक मैसेज आया —

"नई ऐप लॉन्च हुई है… नाम है — KHUSHI."

नीचे लिखा था: Developed by Shukal.

खुशी मुस्कुरा दी। शहर बदल गया था, लेकिन कहानी अभी खत्म नहीं हुई थी।

क्योंकि कुछ रिश्ते दूरी से नहीं, एहसास से जुड़े होते हैं।

is shakal ke karan sab kharab ho gyl