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Chapter 1 - ek kahani arav ki

रात के ठीक 11:47 बजे, Delhi की सर्द हवा खिड़की से अंदर आ रही थी। आरव अपने कमरे में अकेला बैठा था। बाहर सड़क पर अजीब सी खामोशी थी—इतनी गहरी कि घड़ी की टिक-टिक भी डरावनी लग रही थी।

आज उसके पापा को गुज़रे ठीक एक साल हो गया था। जाते-जाते उन्होंने बस एक बात कही थी—

"आरव, 25 फरवरी की रात… 12 बजे… स्टोर रूम मत खोलना।"

आरव ने कभी उस बात पर ज़्यादा ध्यान नहीं दिया। उसे लगा पापा बुखार में कुछ भी बोल रहे थे। लेकिन पिछले तीन दिनों से उसके फोन पर एक ही मैसेज बार-बार आ रहा था—

"DON'T OPEN IT."

नंबर हर बार अलग होता।

डीपी खाली।

सिर्फ वही मैसेज।

आज 25 फरवरी थी।

उसने हिम्मत जुटाई और स्टोर रूम के सामने जाकर खड़ा हो गया। दरवाज़े पर पुराना जंग लगा ताला लटका था। दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

घड़ी में 11:59…

अचानक लाइट चली गई।

पूरा घर अंधेरे में डूब गया।

फोन की टॉर्च ऑन करते ही उसे महसूस हुआ—कोई उसके पीछे खड़ा है।

वह झट से मुड़ा…

कोई नहीं।

लेकिन तभी उसके फोन पर फिर वही मैसेज आया—

"I AM INSIDE."

आरव के हाथ कांपने लगे।

"अंदर? लेकिन अंदर तो ताला लगा है…"

घड़ी ने 12 बजा दिए।

ताले ने अपने आप क्लिक की आवाज़ की… और नीचे गिर गया।

दरवाज़ा धीरे-धीरे चरमराते हुए खुलने लगा।

अंदर घना अंधेरा था… लेकिन अंधेरे में उसे एक परछाईं दिखी—ठीक उसकी तरह… उसकी ही ऊंचाई… उसके जैसे बाल…

वह परछाईं आगे बढ़ी… और फुसफुसाई—

"तुम देर से आए हो, आरव। मैं एक साल से इंतज़ार कर रहा था…"

आरव का गला सूख गया—

"तुम… कौन हो?"

परछाईं मुस्कुराई—

"मैं वो हूं… जो कल सुबह तुम्हारी जगह उठेगा।"

और तभी दरवाज़ा जोर से बंद हो गया।

अगली सुबह 26 फरवरी की तारीख थी।

मम्मी ने दरवाज़ा खटखटाया—

"आरव, उठ जाओ बेटा, स्कूल नहीं जाना क्या?"

अंदर से आवाज़ आई—

"जी मम्मी… अभी आता हूं।"

आवाज़ बिल्कुल आरव की थी।

लेकिन बिस्तर के नीचे…

अंधेरे में…

किसी की आंखें खुली थीं।

कल क्या होगा?

असल आरव कौन है?

और स्टोर रूम में अब कौन बंद है…?

जारी रहेगा… 😶